Cinema#1

एक समय था  सिनेमा देखने जाने का मतलब होता था एक बेहतरीन ‘ डे आऊट ‘ ! पूरा परिवार सिनेमा देखने जाता था !

परिवार के सभी बच्चे खुशी में फट पडते थे – क्या पहनना है ? कॅसा दिखना है ?

सबका पसन्दीदा समय या तो बारह से तीन या तीन से ६ होता था ! हां युवा होती पीढी को अवश्य ही ६ से ९ का शो भाता था !

उस समय फिल्में बिलकुल अलग होती थीं !

यशराज जी की फिल्में यूवक-युवतियों को प्यार की बेहद खूबसूरत दुनिया में ले जाती थीं !

उनकी फिल्म देख कर आने के बाद उस दिन मन उडता-फिरत सा रहता था !
यह नशा कई दिनों तक जाता नहीं था !

राजश्री की पिक्चर तो मम्मी-दादी लोगों की चर्चा का केन्द्र बनी रहती थीं !

पुरूष समाज ज्यादातर गुरू दत्त् (प्यासा, कागज के फूल, आर पार, बाजी, साहब बीबी और गुलाम, सी. आई. डी, जाल), राज कपूर ( आवारा, श्री ४२०, जागते रहो, मेरा नाम जोकर, बॉबी), बी. आर् चोपडा (नया दौर, वक्त, धूल का फूल् निकाह, गुमराह), शक्ति सामन्त (आराधना, अमर प्रेम, कश्मीर की कली, गैम्बलर, अमानुष, हावरा ब्रिज्, कटी पतन्ग) की फिल्में देखना पसन्द करता था ! वोह फिल्में हम लोग आज भी देखते हैं !

दुखी होने पर लोग मुकेश के गाने सुनते थे !

मोहम्मद रफी ऑर किशोर कुमार ने लोगों के दिल पर हमेशा राज किया है ऑर आगे भी करते रहेंगे !

आज सिनेमा बदल गया है !

सिनेमा देखने वाले ऑर सिनेमा बनाने वाले – दोनों ही बदल गये हैं !

गाने आते हैं ! धूम मचाते हैं ! बहुत जल्दी लोग इन्हें भूल भी जाते हैं ! पर जब भी गुनगुनाने को कहा जाये तो आज के दौर में भी कुछ नौजवान पुराने गाने ही सुनते-सुनाते हैं !

कुछ तो पुराने गानों को ही तोड-मरोड कर नई पीढी को पेश करते हैं ! नई पीढी ऐसे गानों को भी गले से लगाती है !

यू तो फिल्म बनाने की विधा बदलते वक्त के साथ-साथ बदल गई है किन्तु ऐस नहीं है कि फिल्में लिखने वाले लोग नहीं हैं ! आज भी इस मुम्बई में लाखों ऐसे लेखक हैं जिनके पास माईल-स्टोन बना देने वाली फिल्में होंगी परन्त दुर्भाग्य-वश वोह सही जगह की तलाश में उनकी फिल्म्-कथायें सिनेमा बनने से पहले ही दम तोड देती हैं !

यही वजह है कि मार्मिक सिनेमा देश के लोगों को पहुंच नहीं पाता क्योंकि हमारे सिनेमा जगत में दरअसल विदेशों की तरह कोई तयशुदा प्रणाली ही नहीं है ! इसीलिये सिनेमा अपना अस्तित्व खोता जा रहा है !

कला हमेशा व्यक्तिगत होती है ! वोह जागीर में नहीं मिलती है ! उस कला को निर्णायक तरीके से व्यक्त करने का कोई स्टेज नहीं है ! इसलिये हजारों अच्छी कहानियां आप तक आ ही नहीं पाती हैं !

मुझे ऐसा लगता है कि शीघ्र ही अब कतारों में पिछडे टैलेन्टेड निर्देशक, लेखक खुद ही अपनी छोटी-छोटी फिल्में बना कर फेस्टिवल्स ऑर सोशल-मीडिया चैनलों पर प्रसारित करना प्रारम्भ करेन्गे (ऐसी शुरूआत हो भी चुकी होगी) और यह फिल्में सिनेमा जगत में परिवर्तन के एक नये दौर का शुभारम्भ करेन्गीं !

My favourite movies: Lamhe, Chandni, Avtaar (Mr. Rajesh Khanna), Bobby, Ankhiyon ke Jhanrokhe Se, Kabhi Alvida Na Kahna and Masoom.

I will translate to English soon.

Thank you friends.

🙂

 

 

 

Advertisements
Cinema#1

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s