Social Behavior ; Communication

मैं इसे साधारण भाषा में कहना चाहूंगी,

“डाक से मेल तक का सफर”

एक समय था जब एक शहर से दूसरे शहर तक सन्देश पहुंचने या पहुंचाने में हफ्तों का समय लग जाता था ! उस समय ” तार ” ही एक ऐसा माध्यम हुआ करता था जिसके ज़रिये आपात घटना घटने की सूचना दी जाती थी, जबकि उसमें भी लगभग चौबीस घण्टे तो लग ही जाते थे !

कई बार तो गांंव के लोग (जो कम शिक्षित होते थे), वोह ” तार आया है ” यह सुनकर ही किसी दुःखद घटना की आशंका से रोना शुरू कर देते थे !

मुझे अच्छे से याद है कि खाकी वस्त्रों में सजा हुआ ‘पोस्टमैन’ दोपहर के समय साईकिल पर बैठकर आते थे और लोगों के घरों में पत्र बांटते जाते जाते ! उनके आने का ईंतजार पूरे घर को होता था क्यों कि वोह दूर बसे हमारे अपनों का सन्देश लेकर आते थे !

जन्मदिन और शादी जैसे पर्वों पर यदि लोग पहुंच नही पाते थे तो वोह मनी-ऑर्डर भेजते थे !

मुझे (मेरे बचपन में) अपने जन्म-दिन पर दादा जी का मनी-ऑर्डर हमेशा ही मिलता था ! वोह बहुत सुखद होता था जब मेरा नाम लेकर पोस्ट्-मैन भाईसाब मुझे बुलाते था और एक पोस्ट्-कार्ड पर (जिस पर बधाई की दो लाईने भी लिखी होती थीं) मुझसे हस्ताछर करवाने के बाद मेरे हाथों में पैसे रख देते थे ! और खुश होकर हम उसी पैसे में से पांच-दस रूपये उन्हें दे देते थे !

बडे होने पर मैं अपने पत्रों का ईंतजार करती थी !

मेरे और मेरे होने वाले पति के बीच विचारों का आदान-प्रदान पत्रों के ज़रिये ही होता था ! सब कुछ बेहद रोमांचक था ! वोह सारे पत्र आज भी हमारे पास हैं !

समय आगे बढा और धीरे-धीरे टेलीफोन ने पैर पसारना शुरू कर दिया ! पहले पहल तो फोन या तो ऑफिसों में होते थे या कुछ सम्भ्रान्त व्यक्तियों के घरों में !

मुझे याद है कि मोह्ल्ले में अगर किसी के घर में फोन होता था तो उस व्यक्ति की भलमनसाहत तो देखिये कि वोह नम्बर मांगने वाले पडोसियों को अपने नम्बर दे देते थे और मोहल्ले भर के लोगों के फोन उनके घर में आते थे और जब जब किसी का फोन आता होता था तो उस भले आदमी का बन्दा आकर कह जाता था कि ” आप टाईम पर आ जाना, फलां-फलां बजे आपका फोन आयेगा” !

और हम खुशी-खुशी अपने भले पडोसी के घर में बैठ अपने फोन के आने का ईंतजार करते थे !

प्रेम तब तक बना हुआ था !
सबके बीच !

पडोसी-पडोसी से ! और रिश्तेदार आपस में ! एकजुटता का परिचय देते थे !

धीरे-धीरे पी. सि. ओ खुलने लगे !

पी. सि. ओ लोगों का एक बडा रोज़गार बनकर समाज में उभरा ! यहां लोग लाईनों में लगकर बारी बारी अपने रिश्तेदारों ऑर सगे-संबंधियों से बात करने का ईंतजार करते थे ! तब तक भी समाज में आपस में एक जुटता और प्यार-भाई चारा था !

फिर एक क्रांती का रूप धर कर मोबाईल फोन ने हमारे समाज में प्रवेश किया !

पहले कॉल आने और जाने , दोनों के पैसे लगते थे ! अत्ः मोबाईल या तो पहले बडे व्यापारियों के पास होते थे या शौकीन लोगों के पास !

फिर अचानक ही मोबाईल्स की दुनिया में बाढ आ गई !

५०० रुपयों के मोबाईल ने अब एक अदने और आम आदमी के घर में जगह बना ली !
इन-कमिंग कॉल फ्री हो गई थीं !

अब लोग रोज़ ही एक दूसरे को कॉल करने लग गये – घर में क्या पक रहा है, से लेकर कंहा जा रहे हैं – एक दूसरे की मिनट-मिनट की गतिविधियां जानने लगे !

बातों में ही सही परन्तु यदि एक भी गलत बात ऐसी आपने मुख से निकली (जो दूसरे व्यक्ति को नागवार गुज़री / या मसालेदर लगी) तो उसे फैलने में समय नही लगता था !

आज यह हाल है कि दूरियां (जो कि एक समय रिश्ते बनाये रखती थीं) इतनी कम हो गई हैं कि बैठे-बिठाये ही किसको, कब, कहां टेन्शन दे दें, कुछ पता नहीं !

फिर स्मार्ट फोन्स ने तो हद ही कर दी !

तकनीकी विकास का यह आलम है कि फोन पर नम्बर और नाम देखकर अपनी मन-मर्ज़ी मुताबिक तय करते हैं कि फोन उठाना है या नहीं !

गलत लोग स्मार्ट फोन पर नाम और पते देखकर फ्रॉड भी करने लगे – मेल हैक करना, फोन हैक करने जैसी गतिविधियों ने कई नये प्रोफेशन्स को जन्म दे दिया है ! हैकिंग अब एक आवश्यक विषय-वस्तु हो गई है !

आम आदमी सुविधा से ज्यादा अब असुविधा का सामन करने लगा है !

समाज के कुछ लोग तो फॉरवर्ड बनते-बनते फ्रॉड बन गये !

तकनीकी के अनुसरंण को तो सर्वस्य वरीयता दी जानी चाहिये परन्तु उसका सही ढंह से समुचित अनुसरण किस प्रकार किया जाये यह जानना भी आवशयक है !

है न ?

आधुनिकता का क्या यही परिणाम है …बताईये तो भला !

शुक्रिया दोस्तों !

🙂

 

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