संवेदनायें !

बनारस !
एक खूबसूरत शहर !

गंगा जी का किनारा !
एक दूसरे का हाथ थामे अस्सी घाट !
हर घाट की अपनी एक कहानी !

शहर का मिज़ाज !

लोगों की मन-मौजियां शहर की अपनी एक क्षटा बिखेरती हॅ !

गंंगा के किनारे शंखनाद ऑर म्ंदिरों के घण्टे आपको बरबस ही रोक लेते हैं कि आप अपना सब कुछ छोड वहां बस जाने के लिये मन से तैयार हो जाते हैं !

गायन्-वादन-न्रित्य-शिक्क्षा यहांं के निवासियों को ईश्वर ने दिल खोल कर प्रदत्त किया है !

लोगों के दिलों में आज भी हमारी हिन्दुस्तानी सभ्यत और सन्स्कृति बसी हुयी है !

बडों का सम्मान, छोटों से प्यार और अजनबियों से अपनापन इस शहर की खासियत है ! तभी तो आज भी बहुत से विदेशी बन्धु जहां भर से कलाओं को सीखने हेतु बनारस आगमन करते हैं ! कईयों ने तो यहां अपने आशियाने बसा लिये हैं !

देश-विदेश से आने वाले पर्यटक यहां के खान्-पान और वेश-भूषा में स्वयम को इसी शहर का बना लेते हैं !

जिस-प्रकार की एकता और भाई-चारा यहां देखने को मिलता है उसकी आप न जाने कितनी मिसालें दे सकते हैं !

कुछ ऐसे भी लोग हैं उन बुजुर्गों की ताउम्र परवरिश करते हैं जिनके स्वजन दूसरे शहरों से लाकर बनारस की धरती पर यह कह कर छोड जाते हैं कि ” हम अभी आते हैं ” !

फिर कभी लौट कर नहीं आते !

कुछ देव्-दूत उनको अपने आश्रम में रखते हैं और अन्त में उनका क्रिया-कर्म भी वही करते हैं, जबकि ज्यादातर बुजुर्गों के घरवाले उनकी सुध लेने कभी नहीं आते !

मैंने आज तक कभी नहीं सुना कि किसी को मरता छोड्कर वहांं के लोग अपना किनारा कर के चले जायें !

कुछेक वर्षों पूर्व मेरी बहन की रात्रि में अकस्मात हुई मृत्य के समय कुछ पडोसियों ने उसे अस्पताल तक पहुंचाने में मदद की थी !

अन्तिम-स्ंस्कार के समय लोग अपने सभी कार्य को परे रखकर घाट पर उपस्थित होते हैं और शरीर के प्ंच्-तत्वों में विलीन होने तक वोह वहां बने रहते हैं !

अच्छे-अच्छे डाक्टर भी चैरिटेबल अस्पतालों में हफ्ते में कम-कम से कम एक बार तो मरीज़ों को समय देते ही हैं !

महानगरों में यह स्ंवेदना कहा चली जाती है ?

यहां पर खाने-पीने में, वीकेन्ड सेलीब्रेट करने में लोग दोस्ती दिखाते हैं परन्तु यदि किसी के घर में कोई घटना घट जाये तो व्हाट्स-अप कर लेंगे और ज्यादा करीबी हुआ तो फोन पर सहानुभूति जताने का सशक्त अभिनय कर देंगे किन्तु उसे देखने अस्पताल या उसके घर देखने नहीं जायेंगे !

सामने कोई मर रहा है तो उसका वीडियो ग्रैब कर लेंगे लेकिन वही हाथ अगले व्यक्ति की जान बचाने के लिये नहीं आगे बढेंगे !

मैं अपने ही कुछ ऐसे दोस्तों की बात करती हूं जो गाडियों में हमारे साथ भर के
घूमने जाते थे, जिनके परिवारों के साथ हम शिर्डी ( धार्मिक जगह पर जाते थे लेकिन मन में स्ंवेदनायें नहीं होती थीं ), महाबलेशवर जैसी जगहों पर जाते थे जिन्हे शायद ही किसी ने कभी स्पान्सर किया हो ! बेचारे मेरे पति तो हमेशा ड्राईवर का किरदार ही निभाते रह जाते थे !

मैं छ्ः महीने जीवन और मृत्यु के बीच रही परन्तु हमारे वही मित्रगण ……
( आप समझ गये होंगे ..)

क्या हम इसे स्ंवेदन-शीलता कह सकते हैं ?

आज़ मुझे लगता है कि किसी भी परिचय को किसी रिश्ते का नाम दिया जाये उससे कहीं ज्यादा अच्छा (तर्क्-स्ंगत भी) है कि उसे सिर्फ इन्सानियत का नाम दिया जाये !

उसी इन्सानियत के नाते अपने जीवन का बहुमूल्य समय ऐसे लोगों को दिया जाये जिनको (भले ही वोह कोई भी हों – किसी भी जगह या वर्ग के – परिचित या अपरिचित) उनके जीवन में हमारी जरूरत है !

जिनसे जुड कर – सुख दुख बांट कर हमें आत्म-सन्टुष्टि की अनुभूति हो और ईशवर से नज़दीकी का अहसास हो !

शायद यही कारण है कि मां अन्न्पूर्णा और शिव जी की कृपा से ६०० वर्षों से अपनी सभ्यता और सन्सकृति को अपने अन्दर समाये हुये मेरा बनारस देश दुनिया के आगे दृढ खडा हुआ है !

बनारस के लोग जंहा भी जाते हैं, बनारस का मिजाज़ उनके साथ जाता है !

I Love Banaras !

Thank you my friends.

🙂

 

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