भावनायें और ईश्वर के ईशारे !

ह्मारे साथ साथ हर किसी के अन्दर ईश्वर का एक अंंश होता है !

इसीलिये ईश्वर हर किसी को उसके जीवन में, समय-समय पर अपने ईशारे देते हैं ! इन ईशारों को कभी तो हम समझ पाते हैं और कभी कभी यह भी होता हॅ कि हम यूं ही तारों को जोड कर सोचने लगते हैं तो पता चलता है कि उस घटना का कारण किसी एक खास बात से जुडा है !

मेरा काट्य विश्वास है कि आपके विचारों और भावनाओं में अगर निश्चलता है तो आप ईश्वर को हर जगह प्राप्त कर सकते हैं !

आत्मा पर ईश्वर का अंंकुश नहीं होता है!
हर आत्मा अपने आप में स्वतन्त्र है अपने बुद्धि-विवेक के अनुसार अपने कर्मों को चरित्रार्थ करने के लिये !

न जाने कितने लोग हैं इस समाज में जो दूसरों के लिये जीवित हैं ! वोह अपने बहुमूल्य योगदान देते हैं बिना सोचे कि लोग क्या कहेंगें ! मुझे लगता है कि वोह अच्छे कार्य इसलिये कर पा रहे हैं क्योंकि उनकी भावनाओं को ईश्वर का साथ मिलता है !

ईशवर ने गरीब-अमीर सभी जनओं को एक जैसा ही पैदा किया है फिर हमारे अन्दर भेद्-भाव की भावना का जन्म कैसे हुआ ?

सोचिये जरा कि धरती पर हम स्वय्म के लिये कितना कुछ भी स्ंचित करके रख लेते हैं परन्तु मृत्यु-पर्यान्त जाते समय हम सब कुछ इसी दुनिया में छोड कर जाते हैं, यहां तक कि अपना यह शरीर भी !

जरा सोच कर देखिये – हमारे पास सबसे अच्छा धन हमारी अच्छी भावना है !

और देखिये न हमारे कर्मों का फल तो हमको मिलता ही है – कुछ प्रारब्ध के रूप में तो कुछ संचित कर्मों के रूप में ! तदुपरांत भी हम एक-दूसरे के प्रति क्यों नहीं सहयोग की भावना रख पाते ?

ईश्वर का संदेश है खाली हाथ आना और खाली हाथ जाना ! तीसरी कोई भी वस्तु नहीं है !

आज की दुनिया में पैसा आवश्यक है किन्तु सिर्फ उतना ही जिससे हम जी सकें और अपनों और दूसरों की मदद कर सकें, उससे ज्यादा नहीं !

अत्ः हम अपनॉ अच्छी भावनाओं को ज़िन्दा रखे तो सुखद हो क्योंकि मृत्यु के उपरांत कुछ भी शेष नहीं रह जाता हॅ ! सारे बंधन इस दुनिया के लिये ही बने हैं और इस दुनिया तक ही सीमित हैं !

केवल ईश्वर ही हैं जिनका न आदि है , न अन्त !

अत्ः अच्छी भावनाओं को रखना श्रेयस्कर है !
खडी बोली मे कहा जाये तो ” प्यार दो, प्यार् लो ”

शुक्रिया दोस्तों !

🙂

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