जिम्मेदारी और समझौतों के बीच खोता व्यक्तित्व !

हम सब लोगों का अपना एक व्यक्तित्व होता है और यह निश्चित मानिये कि हर किसी इन्सान में एक खूबी जरूर होती है ! सच कहूं तो एक कमी (जैसे कि जरूरत से ज्यादा बोलना या चुप रहना, उत्तेजित होना इत्यादि) और एक खूबी (नृत्य् गाना, पढाई, कुकिंग, खेल्-कूद, समाज सेवा, पेन्टिंग इत्यादि) के सथ इन्सान अपना पूरा जीवन जीता है !

उम्र का एक दौर होता है जब आप उन्मुक्त होकर अपना जीवन जीते हैं ! साथ साथ अपने ऊपर बहुत सारे प्रयोग भी करते हैं ! कभी पूरा दिन दोस्तों के तो कभी पूरा दिन कज़िन्स के साथ इकट्ठा होकर कोई न कोई करनामा करते ही रहते हैं !

हर इन्सान के जीवन में ऐसे पल होते हैं जो समय समय पर याद आते हैं !

बीस-पचीस वर्षों तक जिये गये पल सारी जिन्दगी याद किये जाते हैं ! वोह एक मोहक खुशबू की तरह होते हैं ताज़गी देते हैं !

फिर –

एक दौर आता है जब आप अपना परिवार शुरू करते हैं !

अब दो लोग मिलते हैं और परिवार बन जाते हैं ! और यह तो आप जानते ही हैं कि हर हर परिवार का अपना एक परिवेश होता है – खान पान होता है, सोच होती है ! इसीलिये एक दूसरे को समझने वक्त लग जाता है ! कम से कम तीन साल का वक्त !

क्योंकि सभी की अपेक्षाएं अलग अलग होती हैं !

ऐसा भी होता है कि अगर अपेक्षाओं की पूर्ति एक दूसरे के अनुरूप नहीं होती तो वोह एक दूसरे के हिसाब से अपने आप को परिवर्तित करने लगते हैं ! यह बद्लाव धीरे-धीरे शुरू होता है – सबसे पहले वोह अपनी आदतें बदलते हैं ! जैसे कि शादी से पहले जिन कामों को करने से पहले सोचना नहीं होता था, शादी के उपरांत उसे करने के लिये एक्-दूसरे की परमिशन लेनी पडती है !

बोलते समय हर एक बात को बेहद सोच-समझ कर बोलना, पहनावा तक भी दूसरे के अनुसार – इतना कुछ बदलना पडता है कि धीरे-धीरे अपना निज़ि व्यक्तित्व ही बदल जाता है !

फिर जिम्मेदारियांं –

बीतते सालों के साथ जिम्मेदारियांं इस हद तक बढ जाती हैं कि आप स्व्यम को ही भूल जाते हैं ! भूल जाते हैं कि किस खूबी के साथ आप पैदा  हुए थे ! बुराईयां हमेशा निशाने पर रहती हैं !

हम अपने आप से ही प्रश्न करने लगते हैं, ” मेरा परिचय क्या हॅ ? मेरा अस्तित्व क्या है ? ”

आप ही बताईये, ” क्या यह उचित है ? ”

हम जीवन की आपा धापी में अपने आप को ही भुला देते हैं !

प्यार का अर्थ तो एक दूसरे के प्रति सम्मान, विश्वास और योगदान है ! तो फिर यह स्वरूप परिवर्तन क्यों ?

जिन्हें हम प्यार करते हैं उन्हे हम उनके अच्छे-बुरे, दोनों ही स्वरूपों में क्यों नहीं स्वीकार कर सकते ? हर रिश्ते को निभाने के लिये समझौता क्यों ?

हमें सोचने की जरूरत है !

अपने अन्दर उसी उन्मुक्तता को रखना होगा जिसके साथ ईश्वर ने हमको पैदा किया है !

एक बार आत्म-चिंतन कर के देखना तो चाहिये कि क्या हम सही हैं और क्या हमारा यह स्वरूप वही स्वरूप है जिसके साथ ईशवर ने हमें जन्म दिया था !

शुक्रिया दोस्तों !

:))

 

 

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जिम्मेदारी और समझौतों के बीच खोता व्यक्तित्व !

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