कुछ चिन्टु-चिन्टु फिल्म कहानियां#4

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I submitted this concept to Muse Advertising Agency, Mumbai on 21/11/15.

शुक्रिया दोस्तों !

🙂

 

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कुछ चिन्टु-चिन्टु फिल्म कहानियां#4

टेकेन ग्रान्टेड्

२०१० से २०१५ के मध्य मैंने अपने दिल के बेहद करीब कुछ रिश्तों को पल भर में ही हमेशा के लिये दूर होते देखा है !

माता-पिता का प्यार, भाई बहनों की नोंक्-झोंक …इन्हें अपने जीवन में अक्सर ही लोग टेकेन ग्रान्टेड ले लेते हैं ! मैंने भी लिया !

मैं अपनी बहन से दिन में दो बार ऑर अपने पिता से महीनों में एक बार बात करती थी ! शायद मेरे पिता मेरे फोन का रोज़् इन्तज़ार करते होंगे यह अहसास मुझे अभी चन्द रोज़ पूर्व ही हुआ – उनके चले जाने के बाद !

हम भाई बहन आपस में ही बात करके फोन रख देते थे !

उसी तरह हम भाई-बहन आपस में लडते रहते थे ! मेरी बहन मुझे बहुत प्यार करती थी और मैं अपने अपने भाई को ! दोनों छोटे भाई बहन जब आपस में लडते थे तो मैं अपनी बहन को हल्के में लेती थी, बल्कि अक्सर उसकी ही गलती बता कर उसे चुप करा देती थी !

हमेशा की तरह उस रोज़ भी मैंन उसे दिन में फोन किया ! अपनी बहन को !
मैंने उसे बोला कि अब मैं तुम्हें मन्डे को काल करूंगी जबकि कहांं तो मैं उसे रोज़ ही दो या तीन बार बातें करती थी !

मैंने उसे कहा (२०१०-अप्रैल्) “आज कहीं जा रही हूं और अब मन्डे बात करूगीं” ! उसने मुझे कुछ नहीं कहा !

फिर पहले ही की तरह दोनों फिर लड गये उस शाम ! फिर आपस में बातें भी बन्द कर दीं !

अचानक ही रात को मेरी बहन को कुछ घबराहट हुई (तीन बज़े के करीब् फिर तीन मिनट के अंतराल में वोह मुझसे दूर चली गई – कभी वापिस न आने को ! हम भाई बहन को आज यह अह्सास हॅ कि हाम दोनों ने उससे बातें नहीं की थीं उसके जाने से पहले !

मैंने व्यस्तता में नहीं की ! भाई ने लडाई करके नहीं की !

मेरे पिता के अन्तिम पलों में भी मैं फोन पर ही थी – टेकेन ग्रान्टेड !
पता नहीं था कि वोह जा रहे हैं !

इधर कुछ दिनों से मेरे पिता मुझे फोन करते थे, स्वत्ः ही, थोडा नियम से ! फिर अचानक एक दिन उनकी तबियत खराब हुई – सुबह से ही (अक्टूबर २०१५)! मैं फोन पर थी लगातार् ! दूसरे सिरे पर मां थी ! फोन पर जब मुझे उनके हाथ पांव ठन्डे होने की बात बताई गई तो मैंने न जाने क्यों उनके मुंह में
गंगा-जल डालने की बात कही ! मां ने तुलसी के पात्तों के साथ जॅसे ही पवित्र गंगा-जल उनके मुख में डाला मेरे पिता के प्राण पखेरू होकर उनके शरीर से निकल गये !

मुझे अहसास हुआ कि मेरे पिता को उनकी अन्तिम यात्रा से पूर्व मेरे फोन का इन्तज़ार था ! उसी रोज़ वोह मेरे सपनों मे भी आये थे – दिन में ही (५ बजे)!

मैं यह कहना चाह्ती हूं आप सभी से कि आप कितने भी व्य्स्त हों, कहीं भी हों, किसी भी हाल में हों, अपने प्रिजनों से हमेशा अविरल सम्पर्क बनाये रखें ! उनके प्यार को, उनकी केयर को टेकेन्-ग्रान्टेड न लें क्योंकि ज़िन्दगी का कोई भरोसा नहीं है !

शुक्रिया दोस्तों

🙂

 

टेकेन ग्रान्टेड्

मैं और मेरा दोस्त् मोनी !

मोनी मेरा कुत्ता था !

यह कोई मेरी ही उम् का, लगभग तीन साल ! साथ साथ ही इस दुनिया में आये थे हम दोनों !

आज वोह तो नहीं होगा इस दुनिया में लेकिन उसकी कुछ यादें हमेशा से मेरे साथ हॅ !

मांं शिक्षिका थीं !

मैं गोरखपुर में थी उस समय !

गोरखपुर में रहने वाले तीनों मामा की मै बहुत लाडली थी ! विनोद मामा, सुनील मामा और अखिलेश मामा ! तब उनमें से किसी को भी बेटियांं नहीं थीं यह भी एक वजह थी कि उनके घरों में मेरी उपस्थिति दर्ज होनी ही होती थी !

मैं तब विनोद मामा के यहांं थी !

मोनी वहीं रहता था !

बस फर्क यह था कि मैं मामा के साथ सोती थी और मोनी खटिया के ने सोता था ! मैं विनोद मामा को मोनी के भैया कह कर पुकारती थी क्यों कि वोह मेरे साथ साथ ही मोनी को भी घुमाते टह्लाते थ ! जब भी मैं उनसे पूछती की आप उसे भी मेरे साथ साथ क्यों टहलाते हैं तो मामा कहते थे की मैं इसका बडा भाई हूं न, इसलिये !

एक बार तो यूं हुआ कि मैं खेलते खेलते घर से बाहर निकल आई और न जाने कब एक गाय का बछडा भागता हुआ मेरी तरफ आने लगा  ! जॅसे बस कुचल कर निकल जाने वाल हो कुछ सेकन्ड्स में ! मेरा मोनी तो हमेशा की तरफ मेरे आस पास ही घूम रहा था ! जैसे ही मोनी ने उसे देखा वोह जोर से भूंका और कूद कर मेरे और गाय के बछडा के बीच में आ गया ! वोह उसके बाद भी नहीं रुका तो मोनी मेरे ऊपर आ कर खडा हो गया और लगातार भूंकता रहा ! उसका लगातार भूंकना सुनकर अन्दर तो मेरे नाना तेजी से आये और मुझे उठा कर अन्दर ले गये ! लेकिन मेरे मोनी ने उस गाय को गली से बाहर भगा कर ही दम लिया !

शुक्रिया प्यारे दोस्तोंं !

🙂

 

मैं और मेरा दोस्त् मोनी !

जिम्मेदारी और समझौतों के बीच खोता व्यक्तित्व !

हम सब लोगों का अपना एक व्यक्तित्व होता है और यह निश्चित मानिये कि हर किसी इन्सान में एक खूबी जरूर होती है ! सच कहूं तो एक कमी (जैसे कि जरूरत से ज्यादा बोलना या चुप रहना, उत्तेजित होना इत्यादि) और एक खूबी (नृत्य् गाना, पढाई, कुकिंग, खेल्-कूद, समाज सेवा, पेन्टिंग इत्यादि) के सथ इन्सान अपना पूरा जीवन जीता है !

उम्र का एक दौर होता है जब आप उन्मुक्त होकर अपना जीवन जीते हैं ! साथ साथ अपने ऊपर बहुत सारे प्रयोग भी करते हैं ! कभी पूरा दिन दोस्तों के तो कभी पूरा दिन कज़िन्स के साथ इकट्ठा होकर कोई न कोई करनामा करते ही रहते हैं !

हर इन्सान के जीवन में ऐसे पल होते हैं जो समय समय पर याद आते हैं !

बीस-पचीस वर्षों तक जिये गये पल सारी जिन्दगी याद किये जाते हैं ! वोह एक मोहक खुशबू की तरह होते हैं ताज़गी देते हैं !

फिर –

एक दौर आता है जब आप अपना परिवार शुरू करते हैं !

अब दो लोग मिलते हैं और परिवार बन जाते हैं ! और यह तो आप जानते ही हैं कि हर हर परिवार का अपना एक परिवेश होता है – खान पान होता है, सोच होती है ! इसीलिये एक दूसरे को समझने वक्त लग जाता है ! कम से कम तीन साल का वक्त !

क्योंकि सभी की अपेक्षाएं अलग अलग होती हैं !

ऐसा भी होता है कि अगर अपेक्षाओं की पूर्ति एक दूसरे के अनुरूप नहीं होती तो वोह एक दूसरे के हिसाब से अपने आप को परिवर्तित करने लगते हैं ! यह बद्लाव धीरे-धीरे शुरू होता है – सबसे पहले वोह अपनी आदतें बदलते हैं ! जैसे कि शादी से पहले जिन कामों को करने से पहले सोचना नहीं होता था, शादी के उपरांत उसे करने के लिये एक्-दूसरे की परमिशन लेनी पडती है !

बोलते समय हर एक बात को बेहद सोच-समझ कर बोलना, पहनावा तक भी दूसरे के अनुसार – इतना कुछ बदलना पडता है कि धीरे-धीरे अपना निज़ि व्यक्तित्व ही बदल जाता है !

फिर जिम्मेदारियांं –

बीतते सालों के साथ जिम्मेदारियांं इस हद तक बढ जाती हैं कि आप स्व्यम को ही भूल जाते हैं ! भूल जाते हैं कि किस खूबी के साथ आप पैदा  हुए थे ! बुराईयां हमेशा निशाने पर रहती हैं !

हम अपने आप से ही प्रश्न करने लगते हैं, ” मेरा परिचय क्या हॅ ? मेरा अस्तित्व क्या है ? ”

आप ही बताईये, ” क्या यह उचित है ? ”

हम जीवन की आपा धापी में अपने आप को ही भुला देते हैं !

प्यार का अर्थ तो एक दूसरे के प्रति सम्मान, विश्वास और योगदान है ! तो फिर यह स्वरूप परिवर्तन क्यों ?

जिन्हें हम प्यार करते हैं उन्हे हम उनके अच्छे-बुरे, दोनों ही स्वरूपों में क्यों नहीं स्वीकार कर सकते ? हर रिश्ते को निभाने के लिये समझौता क्यों ?

हमें सोचने की जरूरत है !

अपने अन्दर उसी उन्मुक्तता को रखना होगा जिसके साथ ईश्वर ने हमको पैदा किया है !

एक बार आत्म-चिंतन कर के देखना तो चाहिये कि क्या हम सही हैं और क्या हमारा यह स्वरूप वही स्वरूप है जिसके साथ ईशवर ने हमें जन्म दिया था !

शुक्रिया दोस्तों !

:))

 

 

जिम्मेदारी और समझौतों के बीच खोता व्यक्तित्व !